(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.104. अध्यायः 104
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
समयबन्धपूर्वकं गङ्गाशान्तन्वोर्विवाहः॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 1-104-0x(641)(4613)
एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञः सस्मितं मृदु वल्गु च।
यशस्विनी च साऽगच्छच्छान्तनोर्भूतये तदा॥ 1-104-1(4614)
सा तु दृष्ट्वा नृपश्रेष्ठं चरन्तं तीरमाश्रितम्।
वसूनां समयं स्मृत्वाऽथाभ्यगच्छदनिन्दिता॥ 1-104-2(4615)
प्रजार्थिनी राजपुत्रं शान्तनुं पृथिवीपतिम्।
प्रतीपवचनं चापि संस्मृत्यैव स्वयं नृपम्॥ 1-104-3(4616)
कालोऽयमिति मत्वा सा वसूनां शापचोदिता।
उवाच चैव राज्ञः सा ह्लादयन्ती मनो गिरा॥ 1-104-4(4617)
गङ्गोवाच। 1-104-5x(642)
भविष्यामि महीपाल महिषी ते वशानुगा।
न तु त्वं वा द्वितीयो वा ज्ञातुमिच्छेत्कथंचन॥ 1-104-5(4618)
यत्तु कुर्यामहं राजञ्शुभं वा यदि वाऽशुभम्।
न तद्वारयितव्याऽस्मि न वक्तव्या तथाऽप्रियम्॥ 1-104-6(4619)
एवं हि वर्तमानेऽहं त्वयि वत्स्यामि पार्थिव।
वारिता विप्रियं चोक्ता त्यजेयं त्वामसंशयम्॥ 1-104-7(4620)
एष मे समयो राजन्भज मां त्वं यथेप्सितम्।
अनुनीताऽस्मि ते पित्रा भर्ता मे त्वं भव प्रभो॥ 1-104-8(4621)
वैशम्पायन उवाच। 1-104-9x(643)
तथेति सा यदा तूक्ता तदा भरतसत्तम।
प्रहर्षमतुलं लेभे प्राप्य तं पार्थिवोत्तमम्॥ 1-104-9(4622)
प्रतिज्ञाय तु तत्तस्यास्तथेति मनुजाधिपः।
रथमारोप्य तां देवीं जगाम स तया सह॥ 1-104-10(4623)
सा च शान्तनुमभ्यागात्साक्षाल्लक्ष्मीरिवापरा।
आसाद्य शान्तनुस्तां च बुभुजे कामतो वशी॥ 1-104-11(4624)
न प्रष्टव्येति मन्वानो न स तां किंचिदूचिवान्।
स तस्याः शीलवृत्तेन रूपौदार्यगुणेन च॥ 1-104-12(4625)
उपचारेण च रहस्तुतोष जगतीपतिः।
स राजा परमप्रीतः परमस्त्रीप्रलालितः॥ 1-104-13(4626)
दिव्यरूपा हि सा देवी गङ्गा त्रिपथगामिनी।
मानुषं विग्रहं कृत्वा श्रीमन्तं वरवर्णिनी॥ 1-104-14(4627)
भाग्योपनतकामस्य भार्या चोपनताऽभवत्।
शन्तनोर्नृपसिंहस्य देवराजसमद्युतेः॥ 1-104-15(4628)
संभोगस्नेहचातुर्यैर्हावलास्यैर्मनोहरैः।
राजानं रमयामास यथा रज्येत स प्रभुः॥ 1-104-16(4629)
स राजा रतिसक्तोऽभूदुत्तमस्त्रीगुणैर्हृतः॥ ॥ 1-104-17(4630)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुरधिकशततमोऽध्यायः॥ 104 ॥


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